कर्ज की ईंटें: गुजरात के ईंट-भट्टे, जहां मेहनत से पैदा होती है आर्थिक असुरक्षा और बंधन

September 16, 2026
Minakshi
Ambedakar
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कानूनों और कागजी सुरक्षा के बावजूद गुजरात के ईंट-भट्टों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता बंधुआनुमा श्रम, अनौपचारिक कर्ज, बाल मजदूरी और शिक्षा से वंचित होते बच्चे विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं |

भट्ठों पर काम आमतौर पर जून-जुलाई तक चलता है, लेकिन मौसम की अनिश्चितता मजदूरों की कमाई को और अस्थिर बना देती है। फोटो: मीनाक्षी अंबेडकर

33 वर्षीय सद्दाम हुसैन उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले से अपने परिवार  (पत्नी, चार बच्चे, मां, छोटा भाई और बहन कुल 9 सदस्य) और बड़े भाई का परिवार और चाचा के परिवार के साथ गुजरात के गांधीनगर जिले के अडालज के पास उवारसद स्थित एक ईंट-भट्ठे (एसएम ब्रिक किल्न) पर काम कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार की तलाश नहीं, बल्कि कर्ज और जिम्मेदारियों के चक्र में फंसने की एक मजबूरी है।

सद्दाम कहते हैं, “गांव में काम नहीं मिलता और घर चलाने के लिए पैसे चाहिए। इसलिए ठेकेदार से एडवांस लेना पड़ता है। इस साल 50 हजार रुपए एडवांस लिया था, जिसे चुकाने के लिए यहां मजदूरी करने आना पड़ा।”  इस साल यह चक्र और जटिल हो गया है। बदलते मौसम और अनिश्चित बारिश के कारण ईंट बनाने का काम देर से शुरू हुआ। जहां पहले मजदूर अक्टूबर-नवंबर में आ जाते थे, इस बार सद्दाम दिसंबर में आए और काम भी दिसंबर के अंत में शुरू हुआ और देरी से शुरू हुए काम का मतलब है, कम समय में कर्ज चुकाने का दबाव। सद्दाम ने आगे बताया कि “काम देर से शुरू हुआ है, लेकिन कर्ज तो पहले ही ले लिया था। अब कम समय में ज्यादा काम करना पड़ेगा।”

भट्ठों पर काम आमतौर पर जून-जुलाई तक चलता है, लेकिन मौसम की अनिश्चितता मजदूरों की कमाई को और अस्थिर बना देती है। सद्दाम कहते हैं कि “अगर बारिश जल्दी हो गई तो हमें बीच में ही जाना पड़ेगा। तब तक जितना कमाया होगा, उसी से कर्ज भी चुकाना है और घर भी चलाना है।” उनकी गर्भवती छोटी बहन भी साथ आई है, और उसकी डिलीवरी का पूरा खर्च भी सद्दाम को ही उठाना होगा।

सद्दाम जब 11-12 साल के थे, तब 2006 में उनके पिता गुजरात के ही एक ईंट-भट्ठे पर काम करने आए थे। वहीं सांप के काटने से उनकी मौत हो गई। उसके बाद उन्हें अपनी अम्मी के साथ हर साल काम पर आना पड़ा।

सद्दाम की कहानी अकेली नहीं है। हर मजदूर अपने साथ कोई न कोई मजबूरी लेकर आता है। बीमारी, बेरोजगारी, परिवार का खर्च या पुराना कर्ज। लेकिन भट्ठों तक पहुंचते-पहुंचते यह मजबूरी एक ऐसे कर्ज में बदल जाती है, जो सिर्फ मजदूरी नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी को अपने घेरे में ले लेता है।

राज्य में ईंट-भट्ठा उद्योग राज्य के निर्माण क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। गांधीनगर, खेड़ा, पाटण, अहमदाबाद सहित मध्य और उत्तर गुजरात में ईंट भट्ठों की संख्या काफी है। अधिकांश भट्ठे अहमदाबाद से सूरत तक फैले गोल्डन कॉरिडोर में स्थित हैं। हर वर्ष उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से 60–70 प्रतिशत तक प्रवासी मजदूर और उनके परिवार गुजरात आते हैं, जो राज्यों में व्याप्त गरीबी, बेरोज़गारी और सीमित विकल्पों के कारण अग्रिम धन (एडवांस) लेकर भट्ठों पर काम करने के लिए मजबूर होते हैं।

एडवांस की यह व्यवस्था उन्हें पूरे सीजन तक उसी भट्ठे से बंधे रहने पर विवश कर देती है। शारीरिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद वे आर्थिक और सामाजिक रूप से बंधुआ श्रम जैसी स्थितियों का सामना करते हैं। भट्ठों पर श्रमिक प्रतिदिन 12–14 घंटे तक कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, जहां आवास, स्वास्थ्य, पेयजल और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं लगभग नहीं होती। प्रवासी परिवार अस्थायी झुग्गियों में रहते हैं, जिससे बच्चों की शिक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, और पूरा परिवार असुरक्षित, अस्वस्थ और शोषणकारी वातावरण में जीवन बिताने को मजबूर होता है।

मजदूरों को कुचलता गुजरात का ईंट उद्योग 

इस उद्योग में काम करने वाले अधिकांश लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर रह रहे समुदायों से आते हैं। इनमें दलित, आदिवासी, मुस्लिम, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों आए प्रवासी परिवार शामिल हैं। जातिगत भेदभाव, भूमिहीनता, छोटे खेत होना, गांव में स्थायी आय के अभाव और सामाजिक–आर्थिक संसाधनों की कमी इन्हें मजबूर करती है कि वे हर वर्ष अपने परिवार के साथ सैकड़ों हजारों किलोमीटर दूर गुजरात आकर ईंट भट्ठों पर काम करें। अक्सर एक ही परिवार के अनेक सदस्य ईंट ढालने, पकाने, ढोने और लाइन लगाने जैसे श्रमसाध्य कार्यों में लग जाते हैं।

इस श्रम प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है पेशगी/एडवांस का चलन। अधिकांश मजदूर अपने गांव में तत्काल पैसों की आवश्यकता (बीमारी, शादी, घर–खर्च, खेती, दहेज या बेरोजगारी) के कारण भट्ठा मालिकों या ठेकेदारों से एडवांस राशि लेने को बाध्य होते हैं।

मजदूर 30,000 रुपए से 1,50,000 रुपए तक एडवांस लेते हैं, जिस पर कोई ब्याज नहीं होता और यह पैसा वे सीधे ठेकेदार ज्यादातर लेते है,यह एडवांस प्रणाली उन्हें एक तरह के बंधन में बाँध देती है. जहां मजदूर शारीरिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी आर्थिक रूप से बंधे रहते हैं।

सीजन पूरा होने से पहले वे घर नहीं जा सकते जिसमें उनके साथ कई किस्सों में जबरदस्ती होती है पर कई किस्से में ऐसा नहीं है पर कर्ज चुकाए बिना वो जा नहीं सकते या अगले साल वापिस आना पड़ता है; कई बार सीज़न समाप्त होने पर भी उनका कर्ज़ खत्म नहीं होता। इस प्रकार पेशगी की परंपरा मजदूरों को लंबे समय तक कर्ज और निर्भरता के चक्र में धकेलती रहती है। कई मामलों में यह स्थिति बंधुआ मजदूर, अवैतनिक, अनियमित मजदूरी और बाल मजदूरी तक पहुंच जाती है।

अनौपचारिक कर्ज के जाल में फंसते प्रवासी मजदूर परिवार

अधिकांश प्रवासी मजदूर छोटे और असिंचित खेतों, मौसमी कृषि-निर्भरता और वर्षा के पश्चात ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध सीमित कार्य अवसरों के कारण आर्थिक असुरक्षा से प्रभावित होते हैं। इस संरचनात्मक विवशता के चलते वे ईंट-भट्ठा मालिकों या ठेकेदारों द्वारा प्रदान किए जाने वाले अग्रिम धन (एडवांस) को स्वीकार करने के लिए बाध्य होते हैं, जो आगे चलकर उन्हें पूरे सीज़न के लिए कार्य-स्थल से बंधे रहने की स्थिति में ले आता है।

पथाई, भराई निकासी और जलाई वैसे सभी मजदूर की आने वाले मजदूरों का प्रवासन-पैटर्न भिन्न है; वे प्रायः पूरे परिवार के साथ भट्ठों पर आते हैं, किंतु मजदूरी का प्राथमिक कार्य पुरुषों द्वारा संपादित किया जाता है, और कुछ काम में महिलाएं काम करती है साथ के कुछ में महियाए घरेलू श्रम,भोजन-व्यवस्था और बाल-देखभाल जैसी भूमिकाओं में संलग्न रहती हैं।

इनके श्रम का कोई औपचारिक लेखा-जोखा नहीं होता, “अदृश्य” या अवैतनिक परिवार के रूप में उत्पादन-प्रक्रिया का  हिस्सा बने रहते हैं। परिवार-आधारित प्रवासन बच्चों की शैक्षणिक निरंतरता को बाधित करता है और अनेक मामलों में बाल श्रम के उदाहरण भी सामने आते हैं।

गुजरात में ईंट भट्ठों के लिए कानूनी ढांचा

कानून के अनुसार, ईंट भट्ठे कई केंद्रीय और राज्य श्रम कानूनों के दायरे में आते हैं, लेकिन व्यवहार में यह क्षेत्र सबसे अधिक शोषण-प्रवण माना जाता है। ईंट भट्ठा उद्योग अत्यधिक श्रम-प्रधान है और मुख्य रूप से प्रवासी मजदूरों पर निर्भर करता है। इसके बावजूद, यह क्षेत्र श्रम कानूनों के सबसे अधिक उल्लंघन वाला माना जाता है।

कानून के अनुसार, ईंट भट्ठे फैक्ट्री की श्रेणी में आते हैं, जैसा कि फैक्ट्रीज अधिनियम, 1948 में परिभाषित है। इन पर कई महत्वपूर्ण श्रम कानून लागू होते हैं, जैसे—

  • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम
  • वेतन भुगतान अधिनियम
  • अंतर-राज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम
  • बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम
  • बाल श्रम (निषेध) अधिनियम

इन कानूनों का उद्देश्य मजदूरों को सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ, आठ घंटे का कार्यदिवस, न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, यात्रा भत्ता और ऋण-मुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है।

इसके अलावा, इस उद्योग को विभिन्न विभागों से अनुमति लेना आवश्यक होता है, जैसे—

  • राजस्व विभाग से भूमि उपयोग और मिट्टी खनन की अनुमति
  • गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से पर्यावरणीय स्वीकृति
  • उद्योग विभाग से लघु उद्योग पंजीकरण
  • गुजरात मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के नियमों का पालन

इन सभी कानूनी प्रावधानों के बावजूद, जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग दिखाई देती है। ईंट भट्ठों में मजदूरों को औसतन 12–14 घंटे तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जो स्पष्ट रूप से कानूनों का उल्लंघन है।

यह कहानी सिर्फ गरीबी की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो कर्ज़, असमान श्रम संबंध और असुरक्षा के जरिए मजदूरों को एक अंतहीन चक्र में बाँध देती है। ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों का श्रम दिखाई देता है, लेकिन उनका जीवन और अधिकार नहीं।

पेशगी की यह व्यवस्था उन्हें लगातार निर्भर और बंधा हुआ बनाए रखती है, जहाँ मेहनत के बावजूद बाहर निकलना मुश्किल होता है। इसलिए ज़रूरत है ठोस नीतिगत हस्तक्षेप की पारदर्शी भुगतान, पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा की।

सवाल यही है: क्या विकास ऐसा होना चाहिए, जो कुछ लोगों के जीवन की कीमत पर खड़ा हो?

यह लेख सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी  के स्मितु कोठारी फेलोशिप 2025 के अंतर्गत प्रकाशित किया गया था।
यह लेख मूल रूप से डाउन टू अर्थ में प्रकाशित हुआ था और इसे यहाँ पढ़ा जा सकता है।

September 16, 2026
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