पिछले 10 साल में संसद में जलवायु से जुड़े केवल 3% सवाल पूछे गए, सामने आई ये रिपोर्ट

October 5, 2026
Navbharattimes
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सेंटर फॉर फाइनेंसियल अकाउंटेबिलिटी (CFA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से 2025 के बीच संसद में पूछे गए 2.34 लाख से अधिक प्रश्नों में से केवल 3% (8,702 प्रश्न) जलवायु परिवर्तन से संबंधित थे।

Parliament climate questions report
नई दिल्ली: दिसंबर 2025 में खत्म हुए दशक के दौरान संसद में पूछे गए 2.34 लाख से अधिक प्रश्नों में से सिर्फ 8,702, यानी तीन प्रतिशत से कुछ अधिक, जलवायु से संबंधित थे। एक नये विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया है।

विश्लेषण में आया सामने

विश्लेषण में यह भी पाया गया कि स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन डाईऑक्साइड एवं अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाना या समाप्त करना जलवायु से जुड़े प्रश्नों में सबसे आम विषय थे। जलवायु के तहत वर्गीकृत कुल 8,702 प्रश्नों में से 2,938 (33.81 प्रतिशत) सवाल इसी विषय पर थे।

किसने किया अध्ययन

जलवायु वित्तपोषण (0.26 प्रतिशत) और वैश्विक जलवायु शासन (1.2 प्रतिशत) ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बने रहे जिन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। ‘सदन में जलवायु : पेरिस समझौते के बाद से पर्यावरण पर भारत के संसदीय विमर्श’ नाम का यह विश्लेषण बृहस्पतिवार को दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर फाइनेंसियल अकाउंटेबिलिटी’ (सीएफए) ने जारी किया और इसे शोधार्थी हाजिरा पुथिगे ने तैयार किया है।

सीएफए के कार्यकारी निदेशक ने प्रस्तावना में लिखी ये बात

सीएफए के कार्यकारी निदेशक जोए अथियाली ने रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा, ‘‘यह रिपोर्ट (2015) पेरिस समझौते के शुरुआती 10 साल के दौरान जलवायु परिवर्तन पर संसद में हुई चर्चाओं का विश्लेषण करती है ताकि उन मुद्दों को समझा जा सके जिन्होंने राजनीतिक ध्यान आकर्षित किया है और यह देखा जा सके कि जलवायु परिवर्तन को आर्थिक, सामाजिक और विकास से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में किस तरह पेश किया गया है।’’

इन घटनाओं के बारे में पूछे गए प्रश्न

विश्लेषण से यह भी पता चला कि पर्यावरण को होने वाले नुकसान, खासकर वायु प्रदूषण, को बढ़ते मृत्यु दर या खास बीमारियों से जोड़ने के मामले में सरकार ने बार-बार सावधानी भरा रुख अपनाया है। इसके अलावा, विश्लेषण में यह भी पाया गया कि विधायी स्तर पर ध्यान मुख्य रूप से किसी घटना के होने पर या प्रतिक्रिया के तौर पर दिया गया, न कि रणनीतिक रूप से। उदाहरण के लिए, फरवरी 2021 में उत्तराखंड में हिमनद फटने की घटना के बाद ग्लेशियर के पिघलने और बादल फटने जैसी घटनाओं के बारे में प्रश्न पूछे गए। साथ ही, 2022 की भीषण गर्मी के दौरान ही संसद में लू पर पहली बार गंभीरता से चर्चा हुई।

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