नियम आधारित से ताकत आधारित विश्व व्यवस्था में ईरान पर हमला

September 16, 2026
Raj Kumar
Sinha
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नियम आधारित से ताकत आधारित विश्व व्यवस्था में ईरान पर हमला

28 फरवरी 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर एक बड़े पैमाने का सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें मिसाइल और हवाई हमले शामिल है। इस अभियान में ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ सैन्य और राजनयिक नेता मारे गए हैं।ईरान ने जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू किए, जिसमें अमेरिका के सहयोगी देशों के ठिकानों और इज़राइल को लक्षित किया गया, जिससे क्षेत्रीय तनाव चरम पर पहुंच गया है।अमेरिका और इज़राइल का मानना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम न केवल क्षेत्र में बल्कि वैश्विक स्तर पर खतरा है। वे दावा करते हैं कि ईरान “परमाणु हथियारों” तक पहुंच बना रहा था, और उसे रोकना आवश्यक है।इससे पहले जून 2025 में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया था, ताकि संवर्धन योग्य यूरेनियम और हथियार उत्पादन क्षमता को क्षतिग्रस्त किया जा सके।

इज़राइल का दावा है कि ईरान न केवल मिसाइल कार्यक्रम पर काम कर रहा है बल्कि हिज़्बुल्ला, हमास और अन्य छदम समूहों के ज़रिये मध्यपूर्व में अपनी शक्ति बढ़ा रहा है, जो इज़राइल के अस्तित्व पर खतरा है। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनावी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कट्टर सैन्य कदम उठाने का निर्णय लिया है, जिससे अमेरिका “मजबूत” दिखे। इस संघर्ष से तेल की आपूर्ति, मिडिल ईस्ट में निवेश, और वैश्विक बाजार पर दबाव बढ़ेगा। क्योंकि स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम मार्ग हॉर्मुज जलडमरूमध्य खतरे में आ गया है।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की ज़रूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया गया है। जहां से विश्व का लगभग एक-तिहाई समुद्री तेल व्यापार गुजरता है। इससे तेल कीमतों में उछाल से भारत का चालू खाता घाटा बढ़ेगा सकता और रुपये पर दबाव, पेट्रोल-डीजल महंगा, महंगाई में वृद्धि संभावित है।खाड़ी देशों खासकर सऊदी अरब, कतर, कुवैत में लगभग 80 लाख भारतीय कार्यरत हैं। युद्ध की स्थिति में श्रमिकों की वापसी या अस्थिरता से भारत की रेमिटेंस आय प्रभावित हो सकती है।

साम्राज्यवाद में पूंजीवाद की वह अवस्था है जहां एकाधिकार पूंजी का वर्चस्व स्थापित हो जाता है, तो वित्तीय पूंजी और राज्य का गठजोड़ निर्णायक हो जाता है और कच्चे संसाधनों व बाजारों पर नियंत्रण के लिए आक्रामक संघर्ष शुरू हो जाता है। ट्रंप प्रशासन के दौर में अमेरिका ने अपनी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों को फिर से परिभाषित कर रहा है। ट्रंप के शीर्ष सलाहकार स्टीफन मिलर ने हाल में अपने कमेंट्स में एक ऐसी दुनिया का जिक्र किया है जहां “ताकत (स्ट्रेंथ) से शासन होता है, बल (फोर्स) से शासन होता है और शक्ति (पावर) से शासन होता है।”अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा टैरिफ बढ़ाने या टैरिफ लगाने की धमकी को विश्व समुदाय गंभीरता, चिंता और रणनीतिक सतर्कता के साथ ले रहा है। इसे केवल व्यापारिक कदम नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक दबाव की नीति के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका”नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था” को “ताकत आधारित व्यवस्था” में बदल रही हैं। मध्य पूर्व वाले क्षेत्रों में संसाधनों, सुरक्षा और संप्रभुता की खींचतान का केंद्र बनेगा।यह संकेत है कि महाशक्तियों की राजनीति में आज भी संसाधन, सैन्य रणनीति और प्रभुत्व केंद्र में है, जलवायु, लोकतंत्र और मानवाधिकार केवल दिखावा के लिए है। ईरान पर अमेरिका द्वारा किया गया हालिया हमला इसी साम्राज्यवादी तर्क की नग्न अभिव्यक्ति है। यह हमला किसी “लोकतंत्र” या “मानवाधिकार” की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि पूंजी के निर्बाध संचरण में खड़ी बाधा को तोड़ने के लिए है। यह हमला अंतरराष्ट्रीय क़ानून, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का खुला उल्लंघन है, जो किसी भी देश की संप्रभुता के विरुद्ध बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। तथाकथित “नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था” यहां पूरी तरह ध्वस्त दिखाई देती है। अमेरिका ने इससे पहले भी दर्जनों देशों में सत्ता परिवर्तन की कार्रवाइयां की हैं, लेकिन इस बार उसने किसी नैतिक आवरण की भी आवश्यकता नहीं समझी। यह आक्रामकता ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिकी वैश्विक वर्चस्व को गंभीर चुनौतियां मिल रही हैं। चीन का उभार, ब्रिक्स देशों की बढ़ती भूमिका, वैश्विक दक्षिण का आत्मविश्वास और डॉलर केंद्रित व्यवस्था पर सवाल आदि सभी कारक अमेरिकी को हताशा को और अधिक हिंसक बना रहा है। इतिहास बताता है कि घटता वर्चस्व अक्सर बढ़ती आक्रामकता में बदल जाता है। आज आवश्यकता है कि दुनिया, विशेषकर वैश्विक दक्षिण, साम्राज्यवादी दादागिरी के खिलाफ एकजुट होकर खड़ी हो। ईरान के साथ एकजुटता केवल एक देश के समर्थन का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह संप्रभुता, आत्मनिर्णय और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था के पक्ष में खड़े होने का सवाल है। विभिन्न देशों में हस्तक्षेप करने का अमेरिकी कारनामे इतिहास में दर्ज है। 1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग की सरकार गिराई गई। तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया और कठपुतली सरकार की स्थापना किया।2003 में ईरान पर झूठे “वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन” के नाम पर आक्रमण के कारण लाखों मौतें, राज्य संरचना ध्वस्त, तेल और भू-राजनीतिक नियंत्रण कायम किया गया। 1973 में चिली के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित समाजवादी राष्ट्रपति साल्वाडोर आयेंदे की सरकार को गिराया गया।1954 ग्वाटेमाला में भूमि सुधार करने वाली सरकार को हटाया गया।इस कारण दशकों तक गृहयुद्ध और नरसंहार चलता रहा।वियतनाम में 1955–1975 के युद्ध में लाखों नागरिकों की मौत हुई।ये कुछ उदाहरण भर है। इतिहास बताता है कि जहां भी कोई देश अपने संसाधनों और नीतियों पर संप्रभु नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करता है, वहां अमेरिका किसी न किसी रूप में हस्तक्षेप करता रहा है। अपने पहले कार्यकाल में, ट्रंप ने अमेरिका को विदेशी संघर्षों से दूर रखने की कोशिश की। अपने दूसरे कार्यकाल में, ट्रंप ने अक्सर सैन्य बल का सहारा लिया है। पिछले एक साल में, अमेरिका ने मध्य पूर्व के चार देशों (ईरान, इराक, सीरिया और यमन) और अफ्रीका के दो देशों (नाइजीरिया और सोमालिया) पर बमबारी की है। ट्रंप ने अपने दोस्तों और दुश्मनों, दोनों को धमकी दी है।रूस में अमेरिका के पूर्व राजदूत माइकल मैकफॉल ने कहा है कि अमेरिकी जनता को यह सवाल पूछने की जरूरत है कि क्या ये सैन्य हस्तक्षेप हमारी सुरक्षा, हमारी समृद्धि और हमारे मूल्यों को बढ़ा रहे हैं? जबकि भारत के लिए ईरान,अमेरिका और इज़राइल संघर्ष के संदर्भ में विदेश नीति के दीर्घकालिक दिशा पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

राज कुमार सिन्हा। बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

September 16, 2026
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