योजनाओं की भरमार, फिर भी बैगा बच्चों की मौत क्यों?

September 16, 2026
Raj Kumar
Sinha
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आदिवासी स्वास्थ्य नीति की जमीनी परीक्षा

मध्यप्रदेश देश के सबसे बड़े आदिवासी राज्यों में है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की लगभग 21.09 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति से आती है। राज्य की बड़ी आदिवासी आबादी ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में रहती है, जहां गरीबी, रोजगार की अस्थिरता, शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच की समस्या आज भी गंभीर है। ऐसे में बालाघाट जिले के बैगा बहुल इलाकों से अगस्त 2026 में बच्चों की लगातार मौतों की खबर केवल एक स्थानीय स्वास्थ्य घटना नहीं है। यह मध्यप्रदेश की आदिवासी स्वास्थ्य और पोषण नीतियों की जमीनी सफलता पर बड़ा सवाल है।

बिरसा विकासखंड के कोण्डेकसा, बोंदारी, मछुल्दा, कोरका और आसपास के बैगा बहुल गांवों में बुखार तथा अन्य गंभीर लक्षणों के बाद बच्चों की मौत की खबर सामने आई है। सरकारी स्तर पर मृत बच्चों की संख्या आठ बताई गई है, जबकि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने 19 बच्चों की मौत का आरोप लगाया है। इसलिए अंतिम मृत्यु संख्या और बीमारी के कारणों का निर्धारण स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच के बाद ही किया जाना चाहिए। कुछ रिपोर्टों में बुखार, चकत्ते तथा कुछ मामलों में किडनी से संबंधित गंभीर लक्षणों का उल्लेख है। लेकिन एक बात इससे अलग और कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि इन मौतों को केवल किसी एक संक्रामक बीमारी या अचानक फैली महामारी के रूप में देखकर मामला समाप्त नहीं किया जा सकता है। यदि बच्चे पहले से कुपोषित, एनीमिया से पीड़ित अथवा कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले हैं, तो सामान्य संक्रमण भी उनके लिए जानलेवा बन सकता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के अनुसार मध्यप्रदेश में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 35.7 प्रतिशत बौनापन, 19 प्रतिशत दुर्बलता, 33 प्रतिशत कम वजन और 6.5 प्रतिशत गंभीर दुर्बलता दर्ज की गई थी। लेकिन आदिवासी बच्चों की स्थिति इससे भी अधिक चिंताजनक रही है। जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -5 आधारित आंकड़े बताते हैं कि देश में पांच वर्ष से कम उम्र के अनुसूचित जनजाति के बच्चों में बौनापन लगभग 40.9 प्रतिशत था। इसका अर्थ है कि आदिवासी बच्चों का पोषण संकट सामान्य आबादी के संकट से अलग और अधिक गंभीर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। बालाघाट के बैगा समुदाय पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन इस संकट की स्थानीय तस्वीर और स्पष्ट करता है। बैरहर, बालाघाट में 436 परिवारों के 1,197 लोगों पर किए गए सामुदायिक अध्ययन में पाया गया कि पूर्व-स्कूली बैगा बच्चों में दुर्बलता 42.3 प्रतिशत थी, जबकि उसी संदर्भ में ग्रामीण मध्यप्रदेश के बच्चों में यह लगभग 23.8 प्रतिशत थी। वयस्कों में भी क्रोनिक एनर्जी डिफीसिएन्सी अत्यधिक थी,पुरुषों में 55.8 प्रतिशत और महिलाओं में 62.9 प्रतिशत। अध्ययन में अनाज और मोटे अनाज के अलावा अन्य खाद्य पदार्थों तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का सेवन अनुशंसित मात्रा से कम पाया गया।

इससे स्पष्ट है कि बैगा समुदाय का कुपोषण कोई नई घटना नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययन वर्षों पहले चेतावनी दे चुके हैं कि पोषण संबंधी योजनाओं के बावजूद समस्या गंभीर बनी हुई है। बैगा बच्चों के मामले में कुपोषण को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता है कि परिवार को पर्याप्त अनाज मिला या नहीं।

यदि बच्चे को चावल, मक्का अथवा अन्य अनाज पर्याप्त मात्रा में मिल भी जाए, लेकिन उसके भोजन में दाल, दूध, तेल, अंडा, फल, हरी सब्जियां और पशु-आधारित प्रोटीन की पर्याप्त उपलब्धता न हो तो वह कैलोरी तो प्राप्त कर सकता है, लेकिन उसका शरीर आवश्यक प्रोटीन, आयरन, विटामिन और अन्य माइक्रोन्यूट्रिएंट से वंचित रह सकता है। यही वह बिंदु है जहां सरकारी पोषण नीति की परीक्षा होती है। 2019 के एक अध्ययन ने बालाघाट के बैगा बच्चों के कुपोषण के सामाजिक कारणों की पड़ताल करते हुए पाया कि गरीबी, सार्वजनिक सेवाओं से असंतोष, सरकारी कर्मचारियों की उदासीनता और सेवाओं का कम उपयोग समस्या को बढ़ाते हैं। शोधकर्ताओं ने केवल पोषण पूरक देने के बजाय समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत बताई थी। अर्थात समस्या बच्चे की थाली से शुरू होकर स्वास्थ्य केंद्र, आंगनवाड़ी, स्कूल, सड़क, रोजगार, पानी और सरकारी तंत्र तक जाती है। विडंबना यह है कि मध्यप्रदेश में बैगा सहित विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के लिए योजनाओं की कमी नहीं है।

राज्य की आहार अनुदान योजना 2017 से बैगा, भारिया और सहरिया जैसे विशेष पिछड़ी जनजातीय परिवारों को कुपोषण से मुक्ति के उद्देश्य से संचालित है। सरकारी पोर्टल पर भी इसका घोषित उद्देश्य विशेष पिछड़ी जनजाति परिवारों को कुपोषण से मुक्त करना बताया गया है। इसके अलावा आंगनवाड़ी और समेकित बाल विकास योजना (आईसीडीएस), पोषण अभियान, पोषण पुनर्वास केंद्र, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं, आयरन-फोलिक एसिड, टीकाकरण और अन्य योजनाएं चल रही हैं।

सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत पहल प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) है। मध्यप्रदेश में बैगा, भारिया और सहरिया को पीवीटीजी के रूप में लक्षित करते हुए इसका उद्देश्य स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, आवास, स्वच्छ पेयजल, सड़क, बिजली, दूरसंचार और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी दूर करना है। बालाघाट भी पीएम-जनमन के दायरे में आने वाले जिलों में शामिल है। यानी नीति के स्तर पर सरकार स्वयं स्वीकार कर चुकी है कि पीवीटीजी समुदायों की समस्या केवल राशन या स्वास्थ्य शिविर की नहीं बल्कि बहुआयामी वंचना की समस्या है।

बालाघाट की वर्तमान स्थिति इसी सवाल को सामने खड़ा करती है। यदि किसी बैगा बस्ती में बच्चा गंभीर कुपोषण से गुजर रहा है, परिवार को नियमित पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं है, पीने का पानी सुरक्षित नहीं है, स्वास्थ्य केंद्र कई किलोमीटर दूर है, परिवहन उपलब्ध नहीं है और बीमारी की स्थिति में अस्पताल पहुंचने में देर होती है, तो केवल आहार अनुदान या आंगनवाड़ी की मौजूदगी पर्याप्त नहीं होगी।

पीएम-जनमन की मूल भावना भी यही है कि पीवीटीजी परिवारों को केवल योजना का लाभार्थी नहीं बल्कि बुनियादी अधिकारों से वंचित नागरिक के रूप में देखा जाए।
सरकार ने पीवीटीजी बस्तियों के लिए आवास, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और आजीविका को एक साथ जोड़ने का निर्णय लिया है। लेकिन बालाघाट की घटना यह पूछने को मजबूर करती है कि क्या योजनाओं की सूची लंबी होना और उनका वास्तविक लाभ अंतिम परिवार तक पहुंचना एक ही बात है?

वर्तमान मौतों के बाद केवल स्वास्थ्य शिविर लगाना पर्याप्त नहीं होगा। सबसे पहले पिछले दो-तीन महीनों में बैगा बहुल गांवों में हुई सभी बाल मृत्यु का स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट होना चाहिए। प्रत्येक बच्चे की मृत्यु के कारण, बीमारी की अवधि, उपचार कहां मिला, अस्पताल तक पहुंचने में कितना समय लगा, पोषण स्थिति क्या थी, हीमोग्लोबिन कितना था, टीकाकरण की स्थिति क्या थी और परिवार को आंगनवाड़ी तथा स्वास्थ्य सेवाएं कितनी नियमित मिलीं, इन सभी बिंदुओं की जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही प्रत्येक बैगा बस्ती में मासिक बाल स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली बनाई जानी चाहिए। इसमें केवल वजन और ऊंचाई नहीं, बल्कि हीमोग्लोबिन और एनीमिया, गंभीर कुपोषण,संक्रमण, दस्त और बुखार, टीकाकरण, पानी और स्वच्छता, भोजन की विविधता, मातृ पोषण, तथा स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच का नियमित रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। मध्यप्रदेश सरकार के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल बजट या नई योजना घोषित करने का नहीं, बल्कि मौजूदा योजनाओं की डिलीवरी और जवाबदेही का है। आहार अनुदान योजना यदि कुपोषण समाप्त करने के उद्देश्य से चल रही है तो सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए कि बालाघाट के बैगा परिवारों में कितने पात्र परिवारों को इसका नियमित लाभ मिल रहा है। पीएम-जनमन यदि स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की कमी दूर करने के लिए है तो बैगा बस्तियों में कितने स्वास्थ्य उपकेंद्र, सड़क, पेयजल, आवास और आजीविका संबंधी कार्य वास्तव में पूरे हुए हैं, इसकी ग्रामवार जानकारी सामने आनी चाहिए।
इसी तरह आंगनवाड़ी केंद्रों में बच्चों को मिलने वाले पोषण आहार की नियमितता, गुणवत्ता और वास्तविक उपस्थिति का सामाजिक ऑडिट होना चाहिए। सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने करोड़ रुपये खर्च हुए या कितने हितग्राहियों के खाते में पैसा भेजा गया। असली पैमाना यह है कि बैगा बस्ती का बच्चा स्वस्थ है या नहीं। मृत्यु की संख्या को लेकर सरकारी और विपक्षी दावों में अंतर है। बीमारी के कारण को लेकर भी अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं आया है। इसलिए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय स्वतंत्र चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

राज्य सरकार को विशेषज्ञ चिकित्सकों, बाल रोग विशेषज्ञों, महामारी विशेषज्ञों, पोषण विशेषज्ञों और जनजातीय स्वास्थ्य पर काम करने वाले स्वतंत्र संस्थानों की संयुक्त टीम बनानी चाहिए। यह जांच केवल वर्तमान मौतों तक सीमित न हो। पिछले वर्षों में बैगा बहुल क्षेत्रों में बाल मृत्यु, कुपोषण, एनीमिया, मातृ मृत्यु और संक्रामक रोगों के आंकड़ों का भी अध्ययन किया जाए। यदि किसी बीमारी का प्रकोप है तो उसका तत्काल पता लगना जरूरी है। लेकिन यदि मौतों के पीछे कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की संरचनात्मक कमजोरी भी है तो उसे स्वीकार करना और सुधारना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

मध्यप्रदेश में आदिवासी कल्याण की नीति लंबे समय से अनेक योजनाओं में विभाजित रही है। एक योजना पोषण देती है, दूसरी आवास, तीसरी सड़क, चौथी रोजगार और पांचवीं स्वास्थ्य सेवा। लेकिन बैगा परिवार का जीवन विभागों में विभाजित नहीं है। एक ही परिवार में मां कुपोषित हो सकती है, बच्चा एनीमिक हो सकता है, घर में सुरक्षित पानी नहीं हो सकता, रोजगार मौसमी हो सकता है और स्वास्थ्य केंद्र दूर हो सकता है। इसलिए सरकार को ‘बैगा परिवार समग्र स्वास्थ्य एवं पोषण मिशन’ जैसे एकीकृत मॉडल पर विचार करना चाहिए, जिसमें स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, जनजातीय कार्य, खाद्य, पंचायत, ग्रामीण विकास और जल विभाग एक साझा ग्राम-स्तरीय कार्ययोजना के तहत काम करें।

हर बैगा बस्ती के लिए परिवारवार स्वास्थ्य पोषण रजिस्टर हो और गंभीर कुपोषित तथा उच्च जोखिम वाले बच्चों की निगरानी हो। जरूरत पड़ने पर मोबाइल मेडिकल यूनिट और स्थानीय भाषा समझने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की स्थायी व्यवस्था की जाए। बालाघाट के बैगा बच्चों की मौत हमें एक असहज लेकिन जरूरी सवाल के सामने खड़ा करती है। मध्यप्रदेश में योजनाएं हैं। बजट है। आंगनवाड़ी है। आहार अनुदान है। पोषण अभियान है। पीएम-जनमन है। स्वास्थ्य विभाग का पूरा ढांचा है। फिर भी यदि किसी दूरस्थ बैगा बस्ती में बच्चे कुपोषण, संक्रमण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के बीच मरते हैं तो समस्या योजना की अनुपस्थिति नहीं, योजना और जमीन के बीच की दूरी है। वैज्ञानिक अध्ययन वर्षों पहले बता चुके हैं कि बैगा समुदाय में कुपोषण गहरा और बहुआयामी है। अब अगस्त 2026 की घटनाएं सरकार को फिर उसी चेतावनी के सामने खड़ा कर रही हैं।इसलिए सरकार को तत्काल तीन काम करने चाहिए, बाल मृत्यु की स्वतंत्र जांच, प्रत्येक बैगा बस्ती का स्वास्थ्य-पोषण ऑडिट और पीएम-जनमन तथा आहार अनुदान सहित सभी योजनाओं का ग्राम स्तर पर सामाजिक ऑडिट।
आदिवासी विकास की असली सफलता तब मानी जाएगी जब सरकारी रिपोर्टों में योजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि बैगा बच्चों के स्वस्थ जीवन की गारंटी दिखाई दे। सवाल यह नहीं है कि सरकार ने कितनी योजनाएं बनाई हैं। सवाल यह है कि बैगा बस्ती तक पहुंचने से पहले उन योजनाओं में से कितनी रास्ते में ही खत्म हो जाती है।

राज कुमार सिन्हा | बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

September 16, 2026
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