माधव गाडगिल : प्रकृति, विज्ञान और जनतंत्र के पक्षधर पर्यावरणविद्

January 16, 2026
Raj Kumar
Sinha
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भारत में पर्यावरण संरक्षण की वैचारिक और वैज्ञानिक नींव रखने वाले जिन व्यक्तित्वों ने विकास की मुख्यधारा को चुनौती दी, उनमें प्रो. माधव धोंडो केशव गाडगिल का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे न केवल एक प्रतिष्ठित पारिस्थितिकी वैज्ञानिक रहे हैं, बल्कि उन्होंने पर्यावरण को लोकतंत्र, स्थानीय समुदायों और सामाजिक न्याय से जोड़कर देखने का साहसिक प्रयास किया। प्रो. माधव गाडगिल का 7 जनवरी 2026 को पुणे स्थित उनके निवास पर बीमारी के बाद 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे अपने पीछे पारिस्थितिकी विज्ञान और संरक्षण के क्षेत्र में एक गहरी और स्थायी विरासत छोड़ गए हैं। माधव गाडगिल का जन्म 24 अप्रैल 1942 को महाराष्ट्र में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से जीवविज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके पश्चात वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए, जहां उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) में पीएचडी की। भारत लौटने के बाद उन्होंने अपना जीवन देश की जैव विविधता, जंगलों, आदिवासी समाज और प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन एवं संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। वे लंबे समय तक भारतीय विज्ञान संस्थान , बेंगलुरु में प्रोफेसर रहे और भारत में पारिस्थितिकी विज्ञान को एक नई दिशा दी।

गाडगिल का वैज्ञानिक कार्य मुख्यतः जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकी, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और मानव-प्रकृति संबंध पर केंद्रित रहा। उन्होंने यह स्थापित किया कि जंगल केवल लकड़ी या खनिज संसाधन नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय समुदायों की आजीविका, संस्कृति और अस्तित्व से गहराई से जुड़े हैं।
उनका मानना था कि केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट-प्रधान विकास मॉडल पारिस्थितिक असंतुलन और सामाजिक असमानता को बढ़ाता है। इसके विकल्प के रूप में उन्होंने स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर आधारित संसाधन प्रबंधन का सिद्धांत प्रस्तुत किया।

पश्चिमी घाट रिपोर्ट और विकास की बहस

माधव गाडगिल को व्यापक राष्ट्रीय पहचान पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल के अध्यक्ष के रूप में मिली। वर्ष 2011 में प्रस्तुत यह रिपोर्ट पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से अति-संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश करती है। रिपोर्ट में खनन, बड़े बांधों, अनियंत्रित शहरीकरण और औद्योगिक परियोजनाओं पर कड़े प्रतिबंधों की अनुशंसा की गई। साथ ही, निर्णय प्रक्रिया में ग्राम सभा और स्थानीय निकायों को केंद्रीय भूमिका देने पर जोर दिया गया।हालांकि, यह रिपोर्ट उद्योग जगत और कई राज्य सरकारों को असहज लगी और अंततः इसे कमजोर करने का प्रयास किया गया। इसके बावजूद गाडगिल रिपोर्ट आज भी पर्यावरणीय विमर्श में एक साहसिक और वैकल्पिक दस्तावेज़ मानी जाती है। वे जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रमुख शिल्पकारों में से एक थे और जैव विविधता रजिस्टर की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में उनकी केंद्रीय भूमिका रही, जिससे ग्राम पंचायतों को स्थानीय संसाधनों और उनके ज्ञान की समान व न्यायपूर्ण रक्षा का अधिकार मिला।

माधव गाडगिल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने पर्यावरण को केवल वैज्ञानिक या तकनीकी मुद्दा नहीं माना, बल्कि इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ा। वे कहते रहे कि यदि निर्णय कुछ विशेषज्ञों या कॉर्पोरेट समूहों द्वारा लिए जाएंगे, तो पर्यावरण विनाश अवश्यंभावी है। उन्होंने वन अधिकार अधिनियम, ग्राम सभा की भूमिका और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को संरक्षण की कुंजी माना। यह दृष्टिकोण भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विशेष रूप से प्रासंगिक है। प्रो. गाडगिल को उनके योगदान के लिए पद्म भूषण सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा गया। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह जनचेतना है, जिसे उन्होंने पर्यावरण के सवाल पर विकसित किया।

आज जब भारत विकास, जलवायु संकट और प्राकृतिक आपदाओं के चौराहे पर खड़ा है, माधव गाडगिल की सोच हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही टिकाऊ भविष्य का एकमात्र रास्ता है। माधव गाडगिल केवल एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि विकास के वैकल्पिक मॉडल के विचारक हैं। उनका जीवन और कार्य इस बात का प्रमाण है कि सच्चा विकास वही है जो प्रकृति, समाज और लोकतंत्र तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे।

राज कुमार सिन्हा । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

January 16, 2026
Raj Kumar
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