प्रकृति का मौन विलाप: विलुप्त होती प्रजातियों की पुकार

September 16, 2026
Raj Kumar
Sinha
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धरती पर जीवन का इतिहास करोड़ों वर्षों पुराना है, जिसमें असंख्य प्रजातियां उत्पन्न हुई और समय के साथ समाप्त भी हो गई। यह प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से भी होती रही है, लेकिन आधुनिक काल में मानव गतिविधियों ने इसे असामान्य रूप से तेज कर दिया है। पहले भी ज्वालामुखी, उल्कापिंड की टक्कर और प्राकृतिक जलवायु बदलाव से प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। लेकिन सन् 1800 की औद्योगिक क्रांति के बाद से मनुष्यों ने विलुप्ति की दर को बहुत तेज कर दिया है। पिछले 50 वर्षों में पृथ्वी से आधे से अधिक पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, उभयचर और मछलियां लुप्त हो चुकी हैं। पिछले 2000 वर्षों में लगभग 200 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं, और वर्तमान में विलुप्ति की दर प्राकृतिक दर से 1000 गुना अधिक है। एक के अध्ययनों के अनुसार, पृथ्वी पर लगभग 80 लाख प्रजातियां हैं। प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट के अनुसार, वर्तमान में 48,600 से अधिक प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे में हैं और यह विलुप्त होते प्राणियों का मुख्य कारण मानवीय गतिविधियां जैसे आवास विनाश, अवैध शिकार, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन हैं। जंगलों की कटाई, शहरीकरण और कृषि के विस्तार से जानवरों के रहने की जगह खत्म हो रही है। तेजी से बदलते तापमान के साथ प्रजातियां अपने आप को अनुकूलन (एडॉप्ट) नहीं कर पाती हैं। रसायनों और प्लास्टिक के कारण पारिस्थितिक तंत्र खराब हो रहा है।प्रजातियों के विलुप्त होने से खाद्य श्रृंखला बाधित होती है, जो अंततः मानव जीवन, कृषि और प्रकृति के संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।एक छोटे से सूक्ष्म जीव से लेकर समुद्र की नीले व्हेल मछली तक वायुमंडलीय नाइट्रोजन को संतुलित करता है, हमारे वातावरण में संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रत्येक प्रजातियां महत्वपूर्ण है।

विश्व समुदाय को जैव विविधता के नुकसान को रोकने के लिए सख्त संरक्षण उपायों, जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने और प्राकृतिक आवासों को बचाने की आवश्यकता पर जोर देना होगा। पिछली शताब्दी में, उत्साही एवं समर्पित संगठनों और समुदायों ने कई जानवरों और पौधों को विलुप्त होने के कगार से बचा लिया है और अब ये प्रजातियां फल-फूल रही हैं। प्रकृति के संरक्षण के लिए दुनिया भर में प्रयास किए जा रहे हैं, जैसे कि लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए बंदी प्रजनन कार्यक्रम, वन्यजीव अभयारण्य और अंतर्राष्ट्रीय नियम और कानून शामिल है। भारत में विलुप्त हो रही प्रजातियों को बचाने के लिए प्रमुख रूप से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 जैसी कानूनी सुरक्षा मौजूद है, जिसके अंतर्गत 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर , 1992 में प्रोजेक्ट एलीफेंट और 2022 में प्रोजेक्ट चीता जैसी विशिष्ट परियोजनाएं चलाई जा रही है। विश्व के सबसे अधिक जैव विविधता वाले देशों में से एक होने के बावजूद, भारत में लगभग 14 फिसदी प्रजातियां विलुप्त होने के गंभीर खतरे का सामना कर रही हैं। इसलिए, संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए संरक्षण प्रजनन और सहायक प्रजनन रणनीतियों को अपनाना महत्वपूर्ण है। हैदराबाद स्थित विलुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और प्रयोगशालाएं वन्यजीवों के कृत्रिम गर्भाधान और डीएनए बैंक जैसी तकनीकों का उपयोग कर संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। यह भारत की एकमात्र प्रयोगशाला है जिसने वन्यजीवों से वीर्य और अंडाणु एकत्र करने और उन्हें क्रायोप्रिजर्व करने की विधियां विकसित की हैं और लुप्तप्राय काले हिरण, चित्तीदार हिरण और निकोबार कबूतरों का सफलतापूर्वक प्रजनन कराया है। इस कार्य के माध्यम से इसने भारतीय वन्यजीवों के लिए आनुवंशिक संसाधन बैंक की स्थापना की है।

अब तक भारतीय वन्यजीवों की 23 प्रजातियों के आनुवंशिक संसाधनों को एकत्र और संरक्षित किया जा चुका है। सर्व प्रथम 1992 में रियो अर्थ सम्मेलन के दौरान अपनाई गई जैव विविधता अभिसमय (सीबीडी) जो जैव विविधता संरक्षण, उसके सतत उपयोग और लाभों के न्यायपूर्ण वितरण पर केंद्रित है। जिसका उद्देश्य विभिन्न पौधों, जानवरों और सूक्ष्म जीवों की प्रजातियों को बचाना है, प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा उपयोग करना जिससे उनका दीर्घकालिक संतुलन बना रहे और जैव संसाधनों से मिलने वाले लाभों (जैसे औषधीय उपयोग) को सभी देशों और समुदायों में उचित रूप से बांटना है।लगभग सभी देशों ने इस संधि को स्वीकार किया है। यह सरकारों को अपनी नीतियां और योजनाएं बनाने के लिए दिशा प्रदान करती है। इसमें स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान की भूमिका को भी महत्व दिया गया है।जैव विविधता अभिसमय वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की सबसे महत्वपूर्ण संधियों में से एक है, जो पृथ्वी पर जीवन के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।विलुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं बल्कि मानव अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद, इन योजनाओं की सफलता देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सतत विकास मॉडल पर निर्भर करता है।

राज कुमार सिन्ह । बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ

September 16, 2026
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    CFA

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